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Friday, March 17, 2017

इक ख़ामोश नुमाईश

कालिख़ स्याही की थी उन काग़ज़ों पर
या की काला काजल कुछ लिख रहा था पन्नों पर
वो पानी की नमी थी या फिर नमक था आँसुओं का
उस बहाव में कुछ गल गया कुछ फट गया
कुछ आग पर सेंका सहेजा और कुछ जल गया

तपिश में पककर जो काग़ज़ सूखा था
आज भी दामन में कहीं बांधे रखा है
कभी उस पुड़िया को खोलकर देख भर लेने का मन भी होता है
तो सहम कर वापस दबा देती हूँ
कहीं इस ख़ामोश नुमाईश की आग में जलकर राख़ न हो जाए

Wednesday, April 13, 2016

What's the rush?

We rush, rush to get up before the maid rings the bell. We rush, rush to get the breakfast on the table. We rush, rush to pack up the lunch. We rush, rush to get dressed. We rush…

We rush, rush to get fatter bank accounts. We rush, rush to complete the checklists. We rush, rush to meet deadlines. We rush, rush to reach our goals. We rush, rush to the myriad meetings. We rush…

In all this rush and all the hooha about earning for a living, when do we begin living? 

We forget, it is a festival today. We forget, it is a special day. We forget, we have a family waiting for us at home. We forget, for whom we rush. We forget…


Monday, March 21, 2016

मेरी आदत हो तुम...

हाँ तुम मेरी आदत हो...
पर हर आदत बुरी तो नहीं हुआ करती!
मेरी सुबह होती ही है तुम्हारे आने की आस से...
उठने का सबब हो मकसद हो अब तुम...
हाँ मेरी आदत हो तुम...

जब तवा चढ़ाती हूँ gas पर,
तुम्हारी भी तीन रोटियाँ साथ गिनती हूँ,
चाहे तुम घर पर खाओ के ही खाओ...
हाँ सच मेरी आदत हो तुम...

जब घड़ी के काँटे शाम को छह बजाते हैं,
अनायास कदम मेरे चल पड़ते हैं तुम्हें जगाने...
भले वो कमरा खाली ही क्यों हो...
हाँ मेरी आदत ही तो हो तुम...

रात को सोने जाती हूँ जब,
बिस्तर पर जगह तुम्हारी छोड़ कर सोती हूँ,
भले रात भर आओ के आओ तुम,
हाँ मेरी आदत हो गए हो तुम...

सुबह नहाकर तैयार जब होती हूँ,
जबरन इर्द गिर्द मंडराती हूँ,
इत्र की खुशबू, या क़दमों की आहट से भले नींद न टूटे तुम्हारी...
पर तुम मेरी आदत हो...


Thursday, December 3, 2015


ताँती का ताँत, जुलाहे का करघा.
ऊपर नीचे करते, इधर उधर खट खट करते 
आपस में कुछ बातें सी किया करते हैं...

क्या तेरा ताँती तेरे मोह में दिनभर काम किया करता है?
क्यों रे? तेरा भी जुलाहा तो ऊँघते ऊँघते तेरा ही नाम जपता है 
ताँत शर्मा कर लाल हुआ और करघा बड़ी शान से फूल गया.

जाने नासमझ कब समझेंगे, 
ये न ताँत का लगाव है और न ही करघे से कोई प्रेम, 
ये तो निन्यानवें का फेर है...

क्या ही ताँती, क्या ही जुलाहा, 
क्या ही बेचने वाला, क्या ही खरीदने वाला...
सब उलझे हैं गिनती की गाँठों में... पर ये फेर मुआ पूरा ही नहीं होता...

An observation, a commentary on the rampant materialism where we are lost in the hundreds and thousands even as we forget to enjoy the numbers that lie somewhere in the middle...
झीना झीना ताना बाना, जुलाहा यूँ ही बुनता रहा
रंगों संग बतियाता रहा और तागे संग इश्क़ लड़ाता रहा
अपने ही छुटपन के किस्से रंगों में उड़ेंल दिए
रस सब अपने जीवन के तागों में थे बुन दिए

कोई था सूती, कोई खादी और कोई था रेशम 
इक अलग एहसास, इक अलग आस इन सबसे थी बस हरदम 
जुलाहे की थी हर इक के संग अपनी ही कहानी
जो करघे से उतर कर हाट में थी जानी
इस कपड़े को जब मैंने कीना
लगा मुझे वो जाना चीना
पढ़ी मैंने भी जुलाहे की प्रेम कहानी
रंगों और तागों की ही ज़ुबानी

Tuesday, August 4, 2015

The Feminist in me is uncomfortable today...

What does feminism mean to you? Has it taken a weird connotation today where it is simply a misdirected, misguided aggression? I am a married woman, working from home and I love to take care of my home and do my share of chores while passing on a big chunk to the hired help. Does that make me regressive?

Sometimes I feel pressurized by this new age feminism that tells me to do certain things certain ways and puts me in a severely uncomfortable position. Achieving the exact opposite of what it was meant to, to begin with. When feminism puts down these rules for me, it actually transforms into another unhealthy form of chauvinism, a dangerous one, which is disguised and is sneaky. You wouldn’t know how miserably you are stuck until it is really late.

For me feminism has to take me to the proverbial place of peace and comfort of being myself (whatever that may be). If I want to put on make-up, if I want to cook for my man or if I want to be at home and do nothing, feminism should give me the comfort and support to do exactly that. I understand the women’s lib part quite well and I support the women who want to break gender barriers and build a life that they covet. But my problem is with feminists who judge me for doing what I want to do, if it is different from their definition of a “new age woman”.


I am a feminist when I am choosing home over my career, I am a feminist when I am taking care of my family and I sure am a feminist when I am cooking and cleaning and keeping my house the way I want it.

Sunday, August 2, 2015

एक जोड़ा पंखों का

एक जोड़ा जो पंखों का मुझे भी दिया होता...
जब मन होता उड़ जाती...
उड़ान मन की भर पाती...
अपने मन को टोह पाती...
आधा सा जो मन लेके जीती हूँ ...
बाकी का आधा भी ढूंढ पाती..
मन मेरा आधा ही है मेरे पास...
आधा मन तो मायके में छोड़ आई हूँ...
घिरते हैं जब उदासी के बादल...
अम्माँ बहोत याद आती हैं...
छोटी सी भी हो जो चोट...
बाबा का मलहम आता है याद...

अपनी उदासी खुद ही मिटाती हूँ...
अपनी चोट भी खुद ही सहलाती हूँ...
बस सोचा करती हूँ...
एक जोड़ा पंखों का मेरा भी होता...
उड़ जाती मन के साथ...
उड़ जाती मन के पास...